1. झटका! सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना सरकार की अपील क्यों खारिज की?
हाल ही में, तेलंगाना की रेवंत रेड्डी सरकार ने स्थानीय निकाय चुनावों में ओबीसी आरक्षण को 42% तक बढ़ाने की एक बड़ी पहल की थी। यह पहल, SC और ST के मौजूदा कोटे के साथ मिलकर, राज्य में कुल आरक्षण को चौंका देने वाले 67% तक पहुंचा रही थी।
लेकिन इस फैसले पर पहले हाईकोर्ट ने रोक लगाई, और अब देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट ने भी राज्य सरकार की अपील को सिरे से खारिज कर दिया है। जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने एक ही लाइन में पूरी बात स्पष्ट कर दी: आरक्षण की सीमा 50% से ऊपर नहीं जा सकती।
सीधी बात है—आप समाज के एक बड़े वर्ग को आरक्षण देना चाहते हैं, यह अच्छी बात है, लेकिन कानून एक लक्ष्मण रेखा खींचता है, जिसे पार नहीं किया जा सकता।
2. आखिर 50% आरक्षण सीमा का ये ‘ब्रह्मास्त्र’ क्या है?
यह कोई नया नियम नहीं है, बल्कि दशकों पुराना संवैधानिक सिद्धांत है।
- 1992 का इंदिरा साहनी केस: सुप्रीम कोर्ट ने सबसे पहले यहीं स्पष्ट किया था कि किसी भी स्थिति में आरक्षण का कुल प्रतिशत 50% से अधिक नहीं हो सकता। यह सामान्य क्षेत्रों में सामाजिक संतुलन बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी है।
- स्थानीय निकायों के लिए ‘ट्रिपल टेस्ट’: जब बात स्थानीय निकाय चुनावों में ओबीसी कोटा लागू करने की आती है, तो सुप्रीम कोर्ट ने ‘के. कृष्णमूर्ति’ केस में एक खास ट्रिपल टेस्ट नियम (Triple Test) बनाया था। इसका तीसरा और सबसे जरूरी नियम यही है कि ओबीसी कोटा सहित कुल आरक्षण 50% से ज्यादा न हो।
तेलंगाना सरकार ने बेशक एक सामाजिक-आर्थिक सर्वे कराया, लेकिन कोर्ट ने साफ कह दिया कि आपने ‘ट्रिपल टेस्ट’ की बाकी शर्तें पूरी की होंगी, पर जब आपकी कुल आरक्षण सीमा 67% तक पहुंच रही है, तो आप 50% की रेखा को स्पष्ट रूप से तोड़ रहे हैं।
3. तेलंगाना सरकार का ‘जोरदार’ तर्क और कोर्ट का ‘स्पष्ट’ जवाब
तेलंगाना सरकार की ओर से दिग्गज वकील अभिषेक सिंघवी ने जोरदार बहस की। उनका मुख्य तर्क यह था कि यह आरक्षण बढ़ाना एक ‘नीतिगत निर्णय’ है। उन्होंने दलील दी कि राज्यपाल ने विधेयक को लटकाए रखा, इसलिए चुनाव अधिसूचना से पहले यह लागू नहीं हो सका। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि 50% की सीमा ‘कोई अनम्य (inflexible) नियम’ नहीं है।
मगर सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को भी खारिज कर दिया।
- जस्टिस मेहता ने दो टूक कहा: “गवली फैसले में भी 50% आरक्षण सीमा से ऊपर जाने की इजाजत नहीं दी गई थी। आप तमिलनाडु या किसी और राज्य के उदाहरण नहीं दे सकते।”
- जस्टिस नाथ ने फैसला सुनाते हुए सरकार से कहा: “आप अपने चुनाव जारी रख सकते हैं… लेकिन मौजूदा आरक्षण के आधार पर।”
इसका मतलब साफ है—कानून सर्वोपरि है, और चुनाव से ठीक पहले ओबीसी कोटा को बढ़ाकर सियासी फायदा लेने की कोशिश को कोर्ट ने रोक दिया है।
4. अब आगे क्या होगा? स्थानीय चुनाव कैसे होंगे?
सुप्रीम कोर्ट तेलंगाना ओबीसी कोटा पर रोक लगाने वाले हाईकोर्ट के फैसले पर मुहर लगा चुका है।
- चुनाव वर्तमान आरक्षण पर: स्थानीय निकाय चुनाव अब 42% ओबीसी कोटा के बजाय पुरानी आरक्षण व्यवस्था के आधार पर ही होंगे, जिसमें कुल सीमा 50% के भीतर रही होगी।
- सरकार के पास दो विकल्प: तेलंगाना सरकार अब या तो आरक्षण के प्रतिशत को कम करके 50% की सीमा के भीतर लाए, या हाईकोर्ट में ट्रिपल टेस्ट नियम के तहत अपनी वृद्धि को पूरी तरह से सही साबित करने के लिए मजबूत साक्ष्य पेश करे।
कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर आरक्षण के संवैधानिक ढांचे की रक्षा की है और राज्य सरकारों को संदेश दिया है कि आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर ‘नीतिगत निर्णय’ लेते समय भी संवैधानिक सीमाओं का ध्यान रखना अनिवार्य है।
यह फैसला दिखाता है कि आरक्षण का मुद्दा, जो चुनावी राजनीति का केंद्र है, अंततः कानून के सामने झुकता है।